आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। चाहे ऑफिस का काम हो या व्यक्तिगत रिसर्च, हम अक्सर परप्लेक्सिटी एआई (Perplexity AI) जैसे स्मार्ट सर्च इंजनों का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस एआई चैटबॉट से आप अपनी सबसे संवेदनशील बातें साझा कर रहे हैं, वह आपके भरोसे के साथ क्या कर रहा है? साल 2026 की शुरुआत तकनीक की दुनिया में एक बड़े धमाके के साथ हुई है। Perplexity AI Data Privacy Lawsuit की खबरों ने दुनिया भर के इंटरनेट यूजर्स के मन में डर पैदा कर दिया है।
अरविंद श्रीनिवास (Aravind Srinivas) के नेतृत्व वाली इस चर्चित एआई कंपनी पर एक गंभीर मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि कंपनी यूजर्स की सहमति के बिना उनका निजी डेटा टेक दिग्गज गूगल (Google) और मेटा (Meta) के साथ साझा कर रही है। यह मामला न केवल एक कानूनी लड़ाई है, बल्कि यह एआई के दौर में ‘डेटा प्राइवेसी’ (Data Privacy) और ‘यूजर कंसेंट’ (User Consent) पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
Perplexity AI Data Privacy Lawsuit: क्या है पूरा मामला?
ब्लूमबर्ग (Bloomberg) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, सैन फ्रांसिस्को की एक फेडरल कोर्ट में 31 मार्च 2026 को परप्लेक्सिटी एआई के खिलाफ एक क्लास-एक्शन मुकदमा (Class-action Lawsuit) दायर किया गया है। यह मुकदमा ‘जॉन डो’ (John Doe) के नाम से एक गुमनाम यूजर की ओर से दर्ज कराया गया है।
जॉन डो (John Doe) और वित्तीय जानकारी का खुलासा
मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि इस यूजर ने परप्लेक्सिटी के चैटबॉट के साथ अपनी अत्यंत निजी और संवेदनशील वित्तीय जानकारी साझा की थी। इसमें शामिल था:
- उसके परिवार की आर्थिक स्थिति का विवरण।
- टैक्स से जुड़ी उसकी देनदारियां (Tax Obligations)।
- उसका निवेश पोर्टफोलियो (Investment Portfolio) और भविष्य की निवेश रणनीतियां।
यूजर का दावा है कि उसने परप्लेक्सिटी पर भरोसा किया था कि उसकी बातें सुरक्षित रहेंगी, लेकिन बाद में पता चला कि यह जानकारी तीसरे पक्ष (Third-party) तक पहुँच गई है।
ट्रैकर्स का मायाजाल: कैसे लीक हो रहा है आपका डेटा?
Perplexity AI Data Privacy Lawsuit में जो सबसे चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, वह है कंपनी का डेटा ट्रैकिंग सिस्टम। मुकदमे के अनुसार, जैसे ही कोई यूजर परप्लेक्सिटी के होमपेज पर लॉग इन करता है, उसके डिवाइस पर गुप्त रूप से ‘ट्रैकर्स’ (Trackers) डाउनलोड हो जाते हैं।
मेटा और गूगल को “फुल एक्सेस”
आरोप है कि ये ट्रैकर्स मेटा (फेसबुक की मूल कंपनी) और गूगल को यूजर और एआई मशीन सर्च इंजन के बीच होने वाली पूरी बातचीत का सीधा एक्सेस दे देते हैं। इसका मतलब है कि आप जो कुछ भी चैटबॉट से पूछते हैं या बताते हैं, वह सीधे तौर पर इन बड़ी कंपनियों के सर्वर तक पहुँच सकता है
“Incognito” मोड का भ्रम: क्या वाकई कुछ निजी है?
ज्यादातर यूजर्स प्राइवेसी के लिए ‘इन्कॉग्निटो’ (Incognito) मोड का इस्तेमाल करते हैं। मुकदमे में दावा किया गया है कि परप्लेक्सिटी का इन्कॉग्निटो मोड भी सुरक्षित नहीं है।
- धोखाधड़ी का आरोप: शिकायतकर्ता का कहना है कि जब यूजर इन्कॉग्निटो मोड चुनता है, तब भी उनके डिवाइस पर ट्रैकर्स इंस्टॉल किए जाते हैं।
- टारगेटेड विज्ञापन: आरोप है कि इस लीक हुए डेटा का उपयोग गूगल और मेटा द्वारा ‘टारगेटेड एडवरटाइजिंग’ (Targeted Advertising) के लिए किया जा रहा है। यानी आप जो एआई से पूछेंगे, उसी से जुड़ी चीजें आपको फेसबुक या गूगल सर्च पर विज्ञापनों के रूप में दिखाई देंगी।
अरविंद श्रीनिवास और कंपनी की प्रतिक्रिया
जब यह मामला दुनिया के सामने आया, तो परप्लेक्सिटी एआई की ओर से त्वरित प्रतिक्रिया दी गई। हालांकि, कंपनी ने इन आरोपों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है।
परप्लेक्सिटी के प्रवक्ता जेसी ड्वायर (Jesse Dwyer) के अनुसार:
“हमें इस विवरण से मेल खाने वाला कोई भी मुकदमा अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है, इसलिए हम इसकी सच्चाई या दावों की पुष्टि करने में असमर्थ हैं।”
वहीं दूसरी ओर, मेटा ने अपनी नीतियों का हवाला देते हुए कहा है कि विज्ञापनदाताओं को कंपनी को संवेदनशील जानकारी भेजने की अनुमति नहीं है। गूगल ने इस पर अभी तक कोई आधिकारिक विस्तृत टिप्पणी नहीं की है। अरविंद श्रीनिवास, जो खुद इस कंपनी के चेहरे हैं, के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि उनकी कंपनी को ‘गूगल का विकल्प’ माना जा रहा था।
एआई (AI) और डेटा प्राइवेसी: भविष्य की चुनौतियां
Perplexity AI Data Privacy Lawsuit केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है। यह पूरी एआई इंडस्ट्री के लिए एक अलार्म की तरह है। यदि एक अग्रणी एआई कंपनी डेटा प्राइवेसी के मानकों पर खरी नहीं उतरती, तो यूजर्स का भरोसा टूटना तय है।
आपको क्या खतरा हो सकता है?
- वित्तीय जोखिम: यदि आपकी टैक्स या बैंक संबंधी जानकारी लीक होती है, तो यह फ्रॉड का कारण बन सकती है।
- प्रोफेशनल डेटा: यदि आप अपने ऑफिस के सीक्रेट प्रोजेक्ट्स एआई के साथ डिस्कस करते हैं, तो वे प्रतिस्पर्धी कंपनियों तक पहुँच सकते हैं।
- पर्सनल प्रोफाइलिंग: बड़ी टेक कंपनियां आपकी पसंद, नापसंद और कमजोरियों का एक डेटाबेस तैयार कर सकती हैं।
एआई का उपयोग करते समय सुरक्षित कैसे रहें?
जब तक Perplexity AI Data Privacy Lawsuit का कोई अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक आपको खुद अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
- संवेदनशील डेटा साझा न करें: कभी भी अपना पासवर्ड, आधार कार्ड नंबर, बैंक डिटेल्स या टैक्स संबंधी दस्तावेज किसी भी चैटबॉट में न डालें।
- प्राइवेसी सेटिंग्स चेक करें: हमेशा एआई टूल की सेटिंग्स में जाकर ‘Data Training’ या ‘Third-party Sharing’ के विकल्प को डिसेबल (Disable) करें।
- विश्वसनीय टूल्स का चुनाव: केवल उन टूल्स का उपयोग करें जिनकी प्राइवेसी पॉलिसी स्पष्ट और पारदर्शी हो।
- VPN का उपयोग: कुछ हद तक ट्रैकर्स से बचने के लिए एक अच्छे वीपीएन (VPN) का सहारा लिया जा सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Perplexity AI Data Privacy Lawsuit एआई की चमक के पीछे छिपे अंधेरे को उजागर करता है। अरविंद श्रीनिवास की कंपनी ने निस्संदेह सर्च इंजन की दुनिया में क्रांति लाई है, लेकिन अगर यह क्रांति यूजर्स की निजता की कीमत पर है, तो इसकी उम्र लंबी नहीं होगी। जॉन डो द्वारा लगाया गया यह आरोप अगर सच साबित होता है, तो परप्लेक्सिटी को करोड़ों डॉलर का जुर्माना और अपनी साख खोने का सामना करना पड़ सकता है।
एआई का भविष्य केवल ‘इंटेलिजेंस’ पर नहीं, बल्कि ‘एथिक्स’ (Ethics) पर निर्भर करेगा। एक जागरूक यूजर के तौर पर हमें तकनीक का लाभ तो उठाना चाहिए, लेकिन अपनी निजी जानकारी को ताक पर रखकर नहीं।
क्या आप अभी भी परप्लेक्सिटी एआई पर भरोसा करेंगे? क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपकी निजी बातें विज्ञापनों में बदल गई हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. Perplexity AI पर क्या आरोप लगे हैं?
परप्लेक्सिटी एआई पर आरोप है कि वह अपने होमपेज पर ट्रैकर्स के जरिए यूजर्स की निजी बातचीत और संवेदनशील डेटा (जैसे वित्तीय विवरण) गूगल और मेटा के साथ साझा कर रही है।
2. अरविंद श्रीनिवास कौन हैं?
अरविंद श्रीनिवास ‘परप्लेक्सिटी एआई’ (Perplexity AI) के को-फाउंडर और सीईओ हैं। वह भारतीय मूल के हैं और इससे पहले ओपनएआई और गूगल जैसी बड़ी कंपनियों में काम कर चुके हैं।
3. क्या इन्कॉग्निटो मोड में डेटा सुरक्षित रहता है?
मुकदमे के अनुसार, परप्लेक्सिटी का इन्कॉग्निटो मोड भी डेटा सुरक्षित रखने में विफल रहा है और वहां भी तीसरे पक्ष के ट्रैकर्स का उपयोग किया गया है।
4. क्या मुझे अपना एआई चैट इतिहास डिलीट कर देना चाहिए?
यदि आपने संवेदनशील जानकारी साझा की है, तो इतिहास डिलीट करना एक अच्छा कदम है। हालांकि, मुकदमा यह दावा करता है कि डेटा रियल-टाइम में साझा किया जा रहा है।
5. गूगल और मेटा इस डेटा का क्या करते हैं?
आरोप है कि ये कंपनियां इस डेटा का उपयोग यूजर की प्रोफाइलिंग करने और उन्हें टारगेटेड विज्ञापन दिखाने के लिए करती हैं।